जिसने तुमको रब से ज्यादा चाहा

जिसने तुम पे सब कुछ वार दिया

जिसने

ये सूरत की सुर्ख

ये सूरत की सुर्ख कहानी

ये धूपो की उन्माद जवानी

दिल के पावन आँचल पर

मरता ख़ुद के आँखो का पानी

धीरज खोता मनुज कहता

रायगा है ये तमान बातें

जो उसके हित में न आये

जागी हैं वो जो ऐसी अनगिनत रातें

क्या कहता जवाने को अकेला ही है

बंधन में बँधा दर्जन भर वसूलो के

चंद मुट्ठी भर सपने भारी अनगिनत

अपमानो की सरस कहानी है

Ji

कितना बेवस इंसान सा एक सरल मन में हजार ख्वाब सजाये, जिसने सपने में भी अगर जुदाई भी सोची तो ऐसी नही जो मिली, सब कुछ बिल्कुल विपरीत परिस्थितियों में ढलते एक ऐसी कहानी की तरह जहां सुनने या सुनाने वाले दो इंसानों के बीच आँशू की व्यथा बोती हो..

मै इतिहास के अतीत को न पलट रहा न भविष्य के समुंदर में गोते लगा रहा मगर इस कहानी के पात्र या घटनाक्रम में कुछ ऐसा तो है ही जिसे एक मनोरंजन के लिए तो पढ़ा ही जाय साथ अनुभवों या विचारो के साथ अवलोकन भी किया जाय….

बस यूं टाइम पास

बस यूं टाइम पास,

फितरत थी तुम्हारी,

तुमने कभी सोचा ही नहीं,

एक इंसान को कितनी पीड़ा होती है,…

हृदय सबका एक जैसा होता नही,

एक बार फिर से कर दिया वही करिश्मा,

जो तुम सबके साथ किया करते थे,

दीप जला इश्क के बुझा दिया करते थे,….

हर बार बहाने वही पुराने इल्जाम लगा दिया करते थे,

अंदाजा तो कभी तुमने लगाया नही,

क्या होता है परिणाम किसी के दिल से खेलने का,

क्या जानो तुम रातो की उलझन कैसी होती है

कमरे में सन्नाटे की आवाज कानो से टकराती है,

आँखे खुली खुली सागर होती है

दिल की धड़कन सब बेकाबू होती हैं,

मन की गति इतनी भारी होती है,

सब कुछ खतम करने का मन होता है,

इंसान बेवस हो धीरज खोता बस रोता है……

बस यूं टाइम पास फितरत थी तुम्हारी..,!!

कितना जल्दी

कितना जल्दी उतर गया तुम्हारे आँख से मेरे ख्वाबों का पानी,
हम तो रूह में उतर आये, लेकर सात जन्मों की हामी,
हम समझे तुम हो रूह में दीवार बनी जिसके दम पर एक छत का आधार पड़ा ,
जिससेआँचल में मोल नहीं दुखों का जो सवेरा रच संसार सजाती ,
जिनके रूपों में एक सुंदर दर्पण एक ख्वाब का मुकम्मल हो जाना ,
जि्‍सके नयनों में मैं शब्द संसार बसु, जिससे होठों का मै प्यास पुराना,

जिसके बाहो मे मै ख्वाब सजाता, जिनके अधरों से मै चुंबन का प्यास बुझाता

ख़ुद की यादो मे जो

ख़ुद की यादो मे जो खोता हूँ
वो अनगिनत रात जो रोता हूँ
एक ऐसी उलझन होती है न
जगता न सोता हूँ……….
ये पीड़ा ये उपवासी ये है
ये तड़पन पीर उदासी न
जाने कब तक हम सह पायेंगे,
इतनी सारी बैचनी जो दिल से
पिरोता हूँ……..
सारे ख्वाब हमारे बेगाने हो गये
दिल के अरमान पुराने हो गये
ये कैसी दुनिया जो मुझे पास
बुलाती , ये कैसी दुविधा जिससे
चाह के मै दूर न हो पाता हूँ ..

अजब सी जिंदगी है तेरे

अजब सी जिंदगी है तेरे ही ख्वाबों का बंधक हूँ

तेरी रुसवाई मेरी निगाहों में आती जाती है

तेरी सहनाई मेरे कानो मे गुन गुनाती फिर

तेरी यादों का मलवा उठा दिल से चूम लेता हूँ

लेके तेरे ही चेहरे को निगाहों मे घूम लेता हूँ

फितरत से नवाजी है तूने बेवफाई मुझको मगर

फिर भी लगा तेरी तस्वीर को सीने से झूम लेता हूँ

तेरी यादों में मेरी रातें उठ जब बेचैनी मुझमे भरती

मेरी आंखो से बूँद बन जब मेरा दर्द यूं ही पिघलता है

तब तेरी याद आती है रात यूं ही रो रो के निकल जाती है

अजब सी जिंदगी तेरे ख्याबों का बंधक हूँ…..